भरोसा अगर खुदा पर है तो जो लिखा है तकदीर में वही पाओगे भरोसा अगर खुद पे है तो खुदा वही लिखेगा जो आप चाहोगे। एक किसान ने अपने खेतों में लौकी की बेल लगाई, बेल की एक लौकी को जॉब ओ बोहोत छोटी थी किसान ने एक बोतल में डाल दिया। बेल की सारी लौकीयां अपने सामान्य आकार में बढ़ने लगी। पर बोतल वाली लौकी श्रीफ उतनी ही बड़ी जितना बोतल का आकार था। हम सब जानते हैं कि ऐसा क्यों हुआ होगा, बोतल की दीवारें लौकी की हदे बन गई, और अपनी हदों से ज्यादा लकी बढ़ नहीं पाए। हमारे साथ भी तो ऐसा ही होता है। हम अपनी सोच के दायरों से जरा भी आगे नहीं बढ़ पाते। विलियम शेक्सपियर ने कहा है, जीवन सोच के अलावा कुछ नहीं है।हेनरी फोर्ड कहते हैं यदि आपको विश्वास है कि आप कर सकते हैं तो आप कर लेंगे, और यदि आपको अपनी असफलता पर विश्वास है तो भी आप से ही हैं। सच में, बात तो विश्वास की ही है। हमें अपनी सोच के दायरों को तोड़ना होगा, अपनी काल्पनिक हदों से बाहर निकलना होगा, खुद पर विश्वास तो करिए, अगर हमें ही अपने आप पर, अपनी काम पर, आपनि चुनी हुई राहों पर भरोसा नहीं है, तो कोई और कहीं से नहीं आएगा, जो हमें आगे ले जाएगा। खुद पर भरोसा इसी अद्भुत शक्ति के बोदलोत बड़े से बड़ा काम आसान हो जाता है। कोलंबस। कोलंबस श्रीफ अपने दल के साथ नई दुनिया की खोज में निकले थे, तो इस आत्मविश्वास के साथ निकले थे कि वह नई दुनिया की खोज कर के ही लोटेंगे, उनके आत्मविश्वास ने उनके अंदर इतना जोश भर दिया था कि उन्हें यकीन था कि वह अपने मिशन में कामयाब जरूर होंगे। यात्रा आरंभ हुई, और जब राह में रुकावटे आने लगी तो साथी घाबरा गए। कोलंबस से बोले लौट चलो कोलंबस कुछ हासिल होने वाला नहीं है। जान से भी हाथ धो बैठोगे, खुद तो डूबोगे ही, हमें भी डूबाओ गे। मगर कोलंबस ने उनकी एक नहीं सुनी उन्हें तो यकीन था कि वह नई दुनिया की खोज करके ही रहेंगे। कुछ समय और गुजरा, साथियों और बेचैन हुए, कोलंबस से बोले, कोलंबस अब हम तुम्हारा साथ छोड़ देंगे, मरो, खपो, अकेले ही जाओ। मगर कोलंबस अपने इरादों से नहीं हटे। कोलंबस को एहसास भी होने लगा था के, उसे जान से मार देने किस साजिश होने लगी है। मगर कोलंबस के अंदर तो यह विश्वास घर कर गया था कि, एक ना एक दिन उन्हें उनकी मंजिल जरूर मिलेगी। और ऐसा ही हुआ, एक दिन जलपोत की छत से उन्हें रोशनी दिखाई दी, वह चिल्लाये हमने अपनी मंजिल पा ली है। हम सफल हुए, अब तो साथी भी उनका गुणगान करने लगे। एडिशन। सोचिए, उन्हे खुद पर कितना भरोसा होगा, एडिशन बल्ब बनाने की आपने प्रोयोगों मे 10 हजार बार असफल हुए। 10000 बार। वह एक बार असफल हुए, वह दोबारा असफल हुए, वह तीन बार असफल हुए, चलिये ऐसे गिनती करते हैं, पूरे शो बार, हम शो बार गिनती करते करते थक जाएंगे, निराश हो जाएंगे,पर एडीसन? एडीसन 10 हजार बार इस असफलता से गुजरे। फिर ऐसी कौन सी सक्ति थी? जिसने उन्हें एक बार और प्रयास करने के लिए उत्साहित किया होगा। ऐसी कौन सी सक्ति थी? जो उनम्हे ऊर्जा भर रही थी, इतनी अफलताओ के बब्जुद भी, बही जादुई आत्मविश्वास की शक्ति। उन्हें खुद पर भरोसा था, बो देख पा रहे थे एक बल्ब जलता हुआ, रोशनी देता हुआ, दुनिया को प्रकाशित करता हुआ। बो भरोसा लाजवाब था, सोचिए आ बो हार मान लेती तो क्या होता? सोचिए कोलंबस हार मान लेता तो क्या होता? दुनिया ऐसे कई उदाहरणों से भरी हुई है।जिनके सामने कठिन से कठिन परिस्थितिया आए समस्याएं आए पर वो डिगे नहीं। खुद से प्रश्न करते हैं हम अपने आप से चाहते क्या हैं? हम जो चाहते हैं उसके बारे में हमारा मन क्या कहता है? अगर मन में ये विश्वास है कि हम अपनी चाहत को पूरा कर लेंगे, तो यही तो आत्मविश्वास है। इसे बनाए रखिए इससे डिगे नहीं, फिर जीत हमेशा हमारी होगी। सफलता हमारे कदम चूमेगी।
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